अमेरिका और ईरान के बीच चल रही परमाणु वार्ता निर्णायक मोड़ पर पहुंच गई है। अमेरिकी नेतृत्व की ओर से 15 दिन की समयसीमा तय किए जाने के बाद अंतरराष्ट्रीय समुदाय स्थिति पर करीबी नजर रखे हुए है।
विशेषज्ञों का मानना है कि यह समयसीमा कूटनीतिक दबाव बढ़ाने की रणनीति हो सकती है। यदि वार्ता सफल होती है, तो क्षेत्र में स्थिरता और आर्थिक संतुलन बहाल हो सकता है। लेकिन असफलता की स्थिति में तनाव बढ़ने की आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता।
ईरान ने दोहराया है कि वह शांतिपूर्ण परमाणु कार्यक्रम के लिए प्रतिबद्ध है और वार्ता के माध्यम से समाधान चाहता है। वहीं अमेरिकी पक्ष का कहना है कि समझौता तभी संभव है जब पारदर्शिता और निगरानी सुनिश्चित हो।
वैश्विक शक्तियाँ इस मुद्दे को शांतिपूर्ण ढंग से सुलझाने के पक्ष में हैं। अगले कुछ दिन यह तय करेंगे कि कूटनीति जीतती है या टकराव का खतरा बढ़ता है।















