न्यायपालिका में पारदर्शिता और जवाबदेही को लेकर सामने आए ताजा आंकड़ों ने नई बहस को जन्म दिया है। सरकारी जानकारी के अनुसार, बीते 10 वर्षों के दौरान देश में कार्यरत जजों के खिलाफ 8,600 से अधिक शिकायतें प्राप्त हुई हैं। इन शिकायतों में पेशेवर आचरण, निष्पक्ष निर्णय, प्रशासनिक कामकाज और नियमों के पालन से जुड़े मुद्दे शामिल बताए गए हैं।
सूत्रों के अनुसार, हर शिकायत को तय प्रक्रिया के तहत दर्ज किया जाता है। इसके बाद प्राथमिक स्तर पर जांच होती है, ताकि यह स्पष्ट हो सके कि मामला विचार योग्य है या नहीं। बड़ी संख्या में शिकायतें प्रारंभिक जांच में ही खारिज हो जाती हैं, क्योंकि उनमें पर्याप्त तथ्य या प्रमाण नहीं होते। वहीं, गंभीर प्रकृति की शिकायतों पर आगे की प्रक्रिया अपनाई जाती है।
कानूनी जानकारों का मानना है कि शिकायतों की संख्या बढ़ने के पीछे कई कारण हो सकते हैं। एक ओर, डिजिटल प्लेटफॉर्म और शिकायत दर्ज करने की सुविधाएं बढ़ी हैं, वहीं दूसरी ओर नागरिकों में अपने अधिकारों को लेकर जागरूकता भी पहले से कहीं अधिक हुई है। इससे लोग अब अपनी आपत्तियां और शिकायतें खुलकर दर्ज करा रहे हैं।
हालांकि, विशेषज्ञ यह भी कहते हैं कि शिकायत निवारण तंत्र को और अधिक स्पष्ट व समयबद्ध बनाने की जरूरत है। इससे बेबुनियाद शिकायतों पर रोक लगेगी और वास्तविक मामलों में भरोसेमंद कार्रवाई हो सकेगी। साथ ही, इससे न्यायपालिका में जनता का विश्वास भी मजबूत होगा।
सरकार का कहना है कि न्यायिक स्वतंत्रता सर्वोपरि है, लेकिन इसके साथ ही जवाबदेही और पारदर्शिता भी उतनी ही जरूरी है। इसी संतुलन को बनाए रखते हुए सुधारों पर विचार किया जा रहा है।
यह रिपोर्ट ऐसे समय आई है, जब देश में न्यायिक सुधार और संस्थागत विश्वास को लेकर व्यापक चर्चा चल रही है।















