April 16, 2026

ऐप डाउनलोड करें

असम चुनाव 2026 में ULFA की विरासत पर बहस तेज, अतीत के साए में वर्तमान राजनीति

असम विधानसभा चुनाव 2026 के करीब आते ही राज्य में एक बार फिर इतिहास और पहचान की राजनीति केंद्र में आ गई है। खासकर United Liberation Front of Asom (उल्फा) की विरासत को लेकर राजनीतिक और सामाजिक बहस तेज हो गई है। यह संगठन, जिसने एक समय असम की सुरक्षा और स्थिरता को चुनौती दी थी, आज भी चुनावी विमर्श का हिस्सा बना हुआ है।

उल्फा की स्थापना 7 अप्रैल 1979 को सिवसागर के ऐतिहासिक स्थल Rang Ghar में हुई थी। उस समय राज्य के कुछ युवाओं ने यह महसूस किया कि असम के संसाधनों का दोहन हो रहा है और स्थानीय लोगों को उनका हक नहीं मिल रहा। इसी भावना ने एक ऐसे संगठन को जन्म दिया, जिसने अलग असम की मांग को लेकर सशस्त्र आंदोलन का रास्ता अपनाया।

इस संगठन के प्रमुख संस्थापकों में Arabinda Rajkhowa, Paresh Baruah और Anup Chetia शामिल थे। शुरुआती दौर में यह एक वैचारिक आंदोलन था, लेकिन जल्द ही यह उग्रवादी गतिविधियों में शामिल हो गया। 1980 और 1990 के दशक में उल्फा ने राज्य में हिंसा, अपहरण और वसूली जैसी घटनाओं के जरिए अपनी मौजूदगी दर्ज कराई।

इस दौरान Assam Agitation का भी बड़ा प्रभाव देखने को मिला। यह आंदोलन मुख्य रूप से अवैध प्रवासन के खिलाफ था और इसमें छात्र संगठनों की अहम भूमिका रही। All Assam Students’ Union और Assam Jatiyatabadi Yuva Chatra Parishad जैसे संगठनों ने इस आंदोलन को व्यापक जनसमर्थन दिलाया। इसी माहौल में उल्फा को भी समर्थन मिला और उसने खुद को असमिया अस्मिता के रक्षक के रूप में प्रस्तुत किया।

हालांकि समय के साथ राज्य और केंद्र सरकार ने मिलकर कड़े कदम उठाए, जिससे उल्फा की ताकत कमजोर पड़ी। कई शीर्ष नेताओं को गिरफ्तार किया गया, जबकि कुछ गुटों ने शांति वार्ता का रास्ता अपनाया। इसके बावजूद संगठन का नाम और उसकी विचारधारा पूरी तरह खत्म नहीं हुई और यह समय-समय पर चर्चा में आती रही।

आज, जब असम चुनाव 2026 की सरगर्मी बढ़ रही है, राजनीतिक दल उल्फा के अतीत और उसके प्रभाव को अलग-अलग नजरिए से पेश कर रहे हैं। कुछ इसे राज्य के संघर्ष और पहचान की लड़ाई के रूप में देखते हैं, तो कुछ इसे हिंसा और अस्थिरता का प्रतीक मानते हैं।

विशेषज्ञों का कहना है कि उल्फा का उदय उस समय की सामाजिक और आर्थिक परिस्थितियों से जुड़ा हुआ था। बेरोजगारी, संसाधनों के असमान वितरण और सांस्कृतिक असुरक्षा की भावना ने इस संगठन को बढ़ावा दिया। इसलिए इसे केवल एक उग्रवादी संगठन के रूप में देखना पूरी तस्वीर नहीं दिखाता।

वर्तमान में असम की स्थिति पहले से कहीं अधिक स्थिर है, लेकिन चुनावी माहौल में पुराने मुद्दों का उठना स्वाभाविक है। मतदाता भी अब विकास, रोजगार और शांति जैसे मुद्दों को प्राथमिकता दे रहे हैं, हालांकि अतीत की घटनाएं अब भी उनकी सोच को प्रभावित करती हैं।

Hind News 24x7
Author: Hind News 24x7

Leave a Comment

विज्ञापन
और पढ़ें
6
Did you like our Portal?

Did you like our Portal?